शंख : धार्मिक व वैज्ञानिक महत्त्व

शंख : धार्मिक व वैज्ञानिक महत्त्व

सनातन परंपरा में शंख और उसकी ध्वनि को अत्यंत शुभ माना गया है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों में एक शंख भी था। शंख को धार्मिक, वास्तु और आयुर्वेदिक महत्व भी प्राप्त है। कई वैज्ञनिक शोध भी इस पारंपरिक महत्ता पर अपनी मुहर लगा चुके हैं।

शंख की उत्त्पत्ति

विज्ञान की नजर से बात करें तो शंख एक समुद्री जलचर घोंघे का कवच होता है। लेकिन इसके बारे में एक पौराणिक कथा भी पढ़ने को मिलती है। कथानुसार भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक दानव का वध किया था। शंखचूड़ के वध के पश्चात्‌ उसकीअस्थियां सागर में बिखर गयीं। इन्हीं अस्थियों से शंख का जन्म हुआ।

धार्मिक मान्यता है कि
शंख को घर में रखना और उसे नियमित रूप से बजाना शुभ होता है। समुद्र मंथन से ही मां लक्ष्मी और शंख दोनों की उत्पत्ति होने के कारण शंख को इनका भाई माना जाता हैं। इसीलिए कहते हैं कि जिस घर में शंख होता है वहां भगवान विष्णु व धन की देवी लक्ष्मी जी का वास होता है।
वास्तु-शास्त्र के अनुसार
मान्यता है कि शंख एवं इसकी ध्वनि से घर व वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख-जल के छिड़काव से घर की अशुद्धियां दूर होती हैं। घर में सुख-समृद्धि आती है।

वैज्ञनिक शोध
चिकित्सकों का भी मानना है कि शंख बजाना हमारी सेहत के लिए लाभदायक है, खासकर ह्रदय एवं सांस सम्बन्धी उपचार में। मध्य प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर के पूर्व कुलपति व चिकित्सक डॉ0 आर0 एस0 शर्मा द्वारा शंख फूंक कर रक्तचाप को नियंत्रण में रखने सम्बन्धी शोध किया गया। शोध से प्राप्त सकारात्मक परिणाम शंख के वैज्ञानिक महत्त्व को बल प्रदान करते हैं।
अंततः
आस्था और स्वास्थ्य के अद्भुत संगम शंख को इसी कारण हमारे जीवन मूल्यों में शुभ और पवित्र माना गया है।
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