कथरी : एक देसी बिछावन

कथरी : एक देसी बिछावन

कथरी, न सिर्फ एक देसी बिछावन है बल्कि हमारी आत्मनिर्भरता का एक छोटा सा सुन्दर उदहारण भी है। इसे कहीं-कहीं “दसनी” भी कहते है। यह पुराने कपड़ों, चादरों और साड़ियों को आपस में परत-से -परत जोड़कर बनाई जाने वाली एक मोटी चादर जैसी होती है जिसका प्रयोग सामान्यतः बिछावन के रूप में किया जाता है।

विशेषता
पुराने समय में जब सोने-बिछाने के लिए गद्दे या चादर आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे तो घर में बनी यह कथरी ही उसका विकल्प हुआ करती थी। यह आमतौर पर पुराने कपड़ों, साड़ियों या धोती से बनाई जाती है। इसकी विशेष बात यह है की यह हर मौसम के लिए उपयुक्त होती है। घर में बनी होने कारण यह वर्षो तक चलती है। यही कारण है कि आज भी इसकी पहचान एक भरोसेमंद और परंपरागत बिछावन की बनी हुई है।
कथरी बनाने के लिए सबसे पहले उन पुराने कपड़ों (साड़ी, धोती, चादर आदि) का चुनाव किया जाता है जिनका हम इसे बनाने में प्रयोग करते हैं। इसके लिए खासकर सूती कपड़ों का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि सूती कपड़े टिकाऊ और आरामदायक होते हैं। अब जितने परत का यानि जितनी मोटी कथरी बनानी होती है, उतने कपड़ो को एक दूसरे के ऊपर रखकर कैंची की सहायता से एक माप का बना लेते हैं। एक माप का होने के बाद इसके किनारों को चारों तरफ से सुई-धागे से सिलाई कर लेते हैं। अब इसका एक कच्चा स्वरुप तैयार है, जिसे अंतिम रूप देना होता है। परतदार होने के कारण इन्हे आपस में सिलने के लिए में एक मोटे धागे वाली सुई ली जाती है, जिसकी सहायता से आड़ी-तिरछी लाइनों में मनचाही आकृति देते हुए इन्हे आपस में सिलते है। इस सिलाई की प्रक्रिया को ‘तगाई’ कहते है। ‘तगाई’ के बाद इसके किनारों को मजबूत और सुन्दर दिखने के लिए चारो तरफ एक कपडे की पट्टी लगाकर सिला जाता है। और ऐसे तैयार की जाती है पुराने कपड़े से बनी कथरी।
एक बात और
कहीं-कहीं तो कथरी को और मोटा गद्दे जैसा रूप देने के लिए इसमें पुराने हो चुके कपड़ों को कतरन बनाकर इसके अंदर एक सलीके से भरकर इसकी तगाई की जाती है। इससे यह और भी आरामदायक हो जाता है और इसका प्रयोग ओढ़नी के रूप में भी किया जाता है।
एक बात और
यह कथरी एक बार फिर से न सिर्फ हमारे घरों का एक हिस्सा, बल्कि रीसाइकलिंग परंपरा की एक कला के रूप जीविका का साधन भी बन सकती है।
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